न्यूज अंग दस्तक | नेशनल डेस्क
उत्तर भारत इस समय एक दोहरी मार झेल रहा है। एक तरफ आसमान से गिरता पारा हड्डियों को कंपा रहा है, तो दूसरी तरफ हवा में घुला ‘जहर’ फेफड़ों पर वार कर रहा है। राजधानी दिल्ली और एनसीआर (NCR) के इलाकों में प्रदूषण का स्तर एक बार फिर ‘गंभीर’ (Severe) श्रेणी में बना हुआ है, जबकि आज से कश्मीर में कड़ाके की ठंड के प्रतीक ‘चिल्ला-ए-कलां’ की शुरुआत ने मैदानी इलाकों में शीतलहर का अलर्ट जारी कर दिया है।
दिल्ली-NCR: जब सांस लेना बना अभिशाप
राजधानी में वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) कई स्थानों पर 400 और 450 के पार दर्ज किया गया है। यह वह स्तर है जहाँ स्वस्थ व्यक्ति भी बीमार महसूस करने लगता है। स्मॉग (धुंध और धुएं का मिश्रण) की मोटी चादर ने सूरज की रोशनी को धरती तक पहुँचने से रोक दिया है।
प्रदूषण के इस ‘आपातकाल’ को देखते हुए प्रशासन ने GRAP-IV (ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान) के तहत कड़े प्रतिबंध लागू कर दिए हैं। इसके अंतर्गत:
– दिल्ली में पंजीकृत भारी मालवाहक वाहनों के प्रवेश पर प्रतिबंध।
– निर्माण और विध्वंस गतिविधियों पर पूर्ण रोक।
– स्कूली बच्चों के लिए शारीरिक कक्षाओं को बंद कर ऑनलाइन मोड पर शिफ्ट करना।
– सरकारी और निजी दफ्तरों में 50% क्षमता के साथ काम करने की सलाह।
कोहरे का ‘ब्लैकआउट’ और परिवहन पर ब्रेक
सिर्फ प्रदूषण ही नहीं, बल्कि घने कोहरे (Dense Fog) ने उत्तर भारत की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। दृश्यता (Visibility) शून्य से 50 मीटर तक गिर जाने के कारण दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर दर्जनों उड़ानों में देरी हुई है, जबकि कई को डायवर्ट करना पड़ा। रेलवे का हाल भी बुरा है; उत्तर भारत की ओर आने वाली लगभग सभी प्रमुख ट्रेनें 3 से 8 घंटे की देरी से चल रही हैं, जिससे यात्रियों को भारी असुविधा का सामना करना पड़ रहा है।
कश्मीर में ‘चिल्ला-ए-कलां’ का आगाज़
आज यानी 21 दिसंबर से कश्मीर घाटी में ‘चिल्ला-ए-कलां’ की शुरुआत हो गई है। यह 40 दिनों की वह अवधि है जब कश्मीर में कड़ाके की ठंड अपने चरम पर होती है। इस दौरान डल झील समेत पानी के मुख्य स्रोत जम जाते हैं और तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे चला जाता है। इसका सीधा असर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा और राजस्थान के मौसम पर पड़ेगा, जहाँ आने वाले दिनों में बर्फीली हवाएं (शीतलहर) चलने की पूरी संभावना है।
विशेषज्ञों की चेतावनी: स्वास्थ्य पर संकट
डॉक्टरों का कहना है कि यह मौसम हृदय और श्वसन रोगियों के लिए ‘डेथ वारंट’ जैसा है। हवा में मौजूद PM 2.5 कण सीधे रक्त प्रवाह में मिल रहे हैं। कोहरे और प्रदूषण का यह घातक कॉकटेल बुजुर्गों और बच्चों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है।
निष्कर्ष: सरकारें पाबंदियां तो लगा रही हैं, लेकिन क्या GRAP-IV जैसे अस्थायी उपाय इस स्थायी समस्या का समाधान हैं? जब तक पराली, वाहनों के उत्सर्जन और धूल पर दीर्घकालिक रणनीति नहीं बनेगी, तब तक उत्तर भारत हर साल इसी तरह ‘गैस चेंबर’ और ‘कोल्ड टॉर्चर’ के बीच पिसता रहेगा।



