न्यूज अंग दस्तक | मुंगेर
स्थानीय सरस्वती विद्या मंदिर के प्रांगण में आज विश्वविख्यात गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन की जयंती ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में अत्यंत उत्साह और गरिमा के साथ मनाई गई। इस अवसर पर विद्यालय में न केवल उनकी मेधा को नमन किया गया, बल्कि विभिन्न प्रतियोगिताओं के माध्यम से छात्रों और शिक्षकों की तार्किक क्षमता का भी परीक्षण हुआ।
साधना और संकल्प का संगम
कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ प्रधानाचार्य संजय कुमार सिंह, उपप्रधानाचार्य अमन कुमार सिंह, और प्राथमिक एवं बालिका खंड की प्रभारी प्रधानाचार्याओं ने दीप प्रज्वलित कर और रामानुजन जी के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित कर किया।
संबोधन के दौरान प्रधानाचार्य संजय कुमार सिंह ने छात्रों में ऊर्जा भरते हुए कहा, “गणित केवल अंकों का खेल नहीं, बल्कि यह हमारी तार्किक और विश्लेषणात्मक क्षमता को धार देने का माध्यम है। रामानुजन का जीवन हमें सिखाता है कि यदि आपके पास अटूट जिज्ञासा और आत्मविश्वास है, तो सीमित संसाधनों में भी असंभव को संभव बनाया जा सकता है।”
शून्य से शिखर तक का सफर
उपप्रधानाचार्य अमन कुमार सिंह ने रामानुजन के साधारण परिवेश और असाधारण उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। वहीं, कार्यक्रम संयोजक नवनीत चंद्र मोहन ने बताया कि कैसे कठिन परिस्थितियों के बावजूद रामानुजन ने वैश्विक गणित को नई दिशा दी।
शिक्षक उज्ज्वल कुमार ने उनके तकनीकी योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि बिना किसी औपचारिक उच्च शिक्षा के रामानुजन ने संख्या सिद्धांत और अनंत श्रेणियों में जो 3884 सूत्र दिए, वे आज भी आधुनिक विज्ञान की नींव हैं। उन्होंने विशेष रूप से प्रसिद्ध ‘रामानुजन-हार्डी संख्या’ 1729 के महत्व को साझा किया।
जब मैदान में उतरे शिक्षक और छात्र
इस जयंती को ‘नेक्स्ट लेवल’ उत्साह तब मिला जब गणितीय प्रतियोगिताओं का दौर शुरू हुआ। कक्षा 11वीं और 12वीं के छात्रों के लिए आयोजित गणितीय पहेलियों और पहाड़ा प्रतियोगिता में तीखी प्रतिस्पर्धा देखने को मिली।
रोचक आयोजन: छात्रों के साथ-साथ शिक्षकों के लिए भी ‘उल्टी गिनती’ और गणितीय क्विज रखी गई, जिसमें शिक्षकों ने भी छात्रों की तरह पूरे उत्साह के साथ भाग लिया।
पुरस्कार वितरण: बेहतर प्रदर्शन करने वाले एकादश एवं द्वादश के सफल छात्र-छात्राओं को प्रधानाचार्य द्वारा पुरस्कृत कर उनका उत्साहवर्धन किया गया।
निष्कर्ष
यह आयोजन केवल एक जयंती समारोह नहीं, बल्कि छात्रों के भीतर छिपे ‘नन्हे रामानुजन’ को जगाने का एक प्रयास था। विद्यालय परिवार ने संकल्प लिया कि वे रामानुजन के पदचिह्नों पर चलते हुए निरंतर अभ्यास और अनुसंधान की संस्कृति को जीवित रखेंगे।



