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कलम के सिपाहियों का संकल्प: ‘अब डायरियों में दफन नहीं होंगी रचनाएँ’ साहित्य प्रहरी की मासिक गोष्ठी में ‘साहित्यिक कोष’ स्थापना पर हुई गंभीर चर्चा

न्यूज अंग दस्तक | मुंगेर
“साहित्यकार को अपनी रचनाओं के प्रकाशन के लिए किसी का मुँह नहीं ताकना चाहिए। अगर हम एक-दूसरे का संबल बनें, तो अलमारियों में बंद पांडुलिपियाँ भी किताबों की शक्ल ले सकेंगी।” यह सारगर्भित विचार अध्यक्ष यदुनंदन झा ‘द्विज’ ने साहित्य प्रहरी की मासिक गोष्ठी में व्यक्त किए।
रविवार, 21 दिसंबर को मंगल बाजार में आयोजित इस बौद्धिक समागम की शुरुआत अपराह्न 3 बजे यदुनंदन झा की अध्यक्षता में हुई। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि आई.टी.सी. के उपप्रबंधक रेवा शंकर थे, जबकि मंच का कुशल संचालन वरिष्ठ साहित्यकार शिवनंदन सलिल ने किया।

साहित्यकारों के लिए आर्थिक सुरक्षा पर मंथन
गोष्ठी का प्रथम चरण बेहद महत्वपूर्ण रहा, जिसका विषय था— “साहित्यकारों के लिए आर्थिक कोष।” चर्चा की शुरुआत करते हुए अलख निरंजन कुशवाहा ने भावुक स्वर में कहा कि आर्थिक तंगी के कारण कई कालजयी रचनाएँ रचनाकार के साथ ही विदा हो जाती हैं। उनकी रचनाओं को सहेजने के लिए एक सामूहिक कोष का होना अनिवार्य है।
एहतेशाम आलम ने इस प्रस्ताव का पुरजोर समर्थन किया। वहीं, शिवनंदन सलिल ने राजतंत्र और प्रजातंत्र की तुलना करते हुए एक कड़वी सच्चाई सामने रखी। उन्होंने कहा, “पुराने समय में राजा कवियों को आश्रय देते थे, लेकिन आज के दौर में न शासन से मदद मिल रही है और न ही वह सम्मान। हमें आत्मनिर्भर बनकर खुद का कोष बनाना होगा।”
पारदर्शिता और सहयोग पर जोर
ज्योति कुमार सिन्हा ने कोष के प्रबंधन को लेकर आगाह करते हुए कहा कि यदि धन के लेनदेन में पारदर्शिता नहीं रही, तो संस्थाएं विवाद का केंद्र बन जाती हैं। मुख्य अतिथि रेवा शंकर ने सुझाव दिया कि समाज के सक्षम लोग ‘गुप्तदान’ के माध्यम से इस नेक कार्य में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करें। अध्यक्षीय उद्बोधन में द्विज जी ने एक ‘साहित्यिक समाज’ रचने का आह्वान किया ताकि एक-दूसरे के सहयोग से रचनाओं को डायरी से निकालकर पाठकों तक पहुँचाया जा सके। चर्चा में कवयित्री किरण शर्मा और जफर अहमद ने भी अपने विचार साझा किए।
काव्य रस से सराबोर हुई शाम
कार्यक्रम के दूसरे चरण में भव्य कवि गोष्ठी का आयोजन हुआ। सुनील सिन्हा, डॉ. रघुनाथ भगत, और हरिशंकर सिंह ने अपनी कविताओं से माहौल में ऊर्जा भर दी। इसके बाद सनोवर शादाब, विजेता मुद्गलपुरी, ज्योति सिन्हा, और खालिद शम्स ने अपनी अनूठी शैली से श्रोताओं की खूब वाहवाही लूटी। रेवा शंकर और अलख निरंजन कुशवाहा की रचनाओं ने भी उपस्थित जनसमूह को मंत्रमुग्ध कर दिया।
अंत में समाजसेवी प्रकाश नारायण ने सभी अतिथियों और श्रोताओं का धन्यवाद ज्ञापित किया। इस अवसर पर दर्शक दीर्घा में संजय कुमार, विजय पोद्दार, रामदेव जी और विरजू कुमार सहित कई साहित्य प्रेमी मौजूद थे।

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